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मन अशान्त हैअधियारा है

मन अशान्त हैअधियारा है
दुख सह-सह मन दुखियारा है ।
अपना मान रहा है सबको
किन्तु नही मिल सका किनारा ।।

अपना पन की आपा धापी
तृष्णा -मन पर रहती व्यापी ।
खीच दुशासन चीर रहा है
द्रुपद-सुताए रहती कांपी ।।

जिस पर मान भरोसा जागा
जिससे मन का जुडता धागा ।
जब आशायें धूमिल होती
तब सोया मन लगता जागा ।।
डा दीनानाथ मिश्र

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5 Comments

Anjali korde

09-Oct-2023 12:08 PM

V nice

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Punam verma

09-Oct-2023 08:17 AM

Nice

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Abhinav ji

09-Oct-2023 07:51 AM

Nice

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